सीहोर। सुगंधित फूलों के हार, बुके और परफ्यूम के बीच आज भी मुझे पी जी कॉलेज सीहोर के रसायन शास्त्र की लैब की खुश्बू की याद आल्हादित करती है, यह उद्गार च. शे. आ. शास. स्ना. अग्रणी महाविद्यालय के सभागार में सभी प्राध्यापकों और विद्यार्थियों को आनन्द से सराबोर कर गए जब श्री पंकज सुबीर ने अत्यंत भावनात्मक लहजे में महाविद्यालय के सभाागर के मंच से कहे। अवसर था महाविद्यालय के सभागार में प्रतिभा बैंक और हिन्दी विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित मुंशी प्रेमचंद जयंती का जिसमें सुप्रसिद्ध कथाकार एवं महाविद्यालय के पूर्व छात्र पंकज सुबीर को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य जी डी. सिंह ने की ।
आरंभ में प्रतिभा बैंक की प्रभारी एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ पुष्पा दुबे ने प्रतिभा बैंक के गठन का उद्देश्य बताया । इस अवसर पर ज्ञानपीठ युवा पुरस्कार तथा अंतर्राष्ट्रीय कथा यूके सम्मान प्राप्त श्री सुबीर को महाविद्यालय के प्राचार्य जी. डी. सिंह ने शाल, श्रीफल तथा पुष्पगुच्छ से सम्मानित किया गया। छात्रों को साहित्य के प्रति प्रेरित करते हुए श्री सुबीर ने अपने उद्बोधन में कहा कि अपनी प्रतिभा को विकसित करने के लिये शहर छोटा बड़ा नहीं होता, हम अपने व्यक्तित्व से उसे बड़ा बनाते हैं । माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त एवं अन्य साहित्यकार इस बात के प्रमाण हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने व्यक्तित्व विकास एवं साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिये आहवान करते हुए कहा कि आपको तराशने के लिए आपके पीछे बहुत लोग हैं लेकिन आप चोट से घबराएँ नहीं जो पत्थर चोट से घबरा जाता है वह कोई आकार ग्रहण नहीं कर सकता है । हम सबमें एक विशेष गुण होता है जिसे हमें पहचानना होता है और उसे इसी जिन्दगी में दिशा देना होता है । जिस क्षण हम कार्य का आनन्द लेना शुरू कर देंगे अपने सपनों को विस्तार देंगे उसी क्षण हम सबसे अधिक ऊँचाई पर पहुंचेंगे । इस प्रतिभा बैंक एवं महाविद्यालय के मंच से यदि हम वर्ष में 10 प्रतिभाओं को तराश सके तो हम कुछ हद तक अपनी मिट्टी एवं अपने गुरू के प्रति ऋणमुक्त हो सकेंगे। श्री सुबीर ने प्रेमचंद की रचनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज प्रेमचंद पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं, घीसू और माधव आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं।
इस अवसर पर एल.आइ.सी. के फील्ड ऑफीसर रामगोपाल गड़ोदिया ने भी विद्यार्थियों को रोजगार प्राप्ति के अवसरों एवं तैयारी की जानकारी दी । अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य डा जी. डी. सिंह ने मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में जिन समस्याओं को रेखांकित किया है वे आज रूप बदल कर कहीं अधिक विकराल हो गईं हैं। टी वी के सामने हमने अपनी मौलिकता खो दी है । इस दृष्टि से साहित्य के अध्ययन, मनन चिंतन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है ।
डॉ पुष्पा दुबे ने कार्यक्रम का संचालन किया। तृप्ता झा ने आभार व्यक्त किया । इस अवसर पर बड़ी संख्या में महाविद्यालय के छात्र छात्राएं एवं प्राध्यापकगण उपस्थित थे ।








