सीहोर।
मनुष्य को उसके कर्मो के आधार पर ही फल मिलता है। भक्ति, ज्ञान, बैराग्य
और सत्संग के बिना मोक्ष मिलना बड़ा कठिन होता है। भागवत कथा मनुष्य के जीवन
का मु य आधार व सार है। उक्त उद्गार नगर के सिंधी कालोनी में गौदान सरकार
समिति के तत्वाधान में जारी संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन मालवा
माटी के लाल संत श्री गोविन्द जाने ने यहां पर मौजूद बड़ी सं या में
श्रद्धालुओं से कही। उन्होंने कहा कि जैसे हम अपना घर छोड़कर कही दूसरी जगह
जाते है तो हमारा मकान वही पर रह जाता है। मनुष्य कही पर भी चले जाए, लेकिन
उसका आवास वही पर रहता है। आत्मा और शरीर भी आवास की तरह है। यह हमारा
शरीर आवास रूपी है। इसके अंदर रहने वाली आत्मा से हम जो कर्म करते है उसका
फल हमे अंत में भोगना पड़ेगा। संत श्री ने धन बल, राजबल आदि के बारे में
विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि सबसे बड़ा बल कोई है तो वह है हमारा
ईष्टबल इस बल के आगे सभी बल तुच्छ माने गए है। हमें अपने ईष्ट बल से
बलवानहोना चाहिए।
दया धर्म का मूल है
दया धर्म का मूल है पर संत श्री गोविन्द जाने ने कहा कि दया मानव को करना चाहिए, व्यक्ति अज्ञानतावश ईश्वर को जगह-जगह तलाशता फिरता है, जबकि ईश्वर स्वयं उसके अंदर है। बस इसे पहचानने की जरुरत है। जैसे सोने की पहचान जौहरी करता है, उसी प्रकार हमें भी अपने अंदर झांककर ईश्वर के अस्तित्व को महसूस करने की जरूरत है। मनुष्य को यह योनि बार-बार नहीं मिलती लिहाजा मनुष्य को इस योनि का फायदा उठाते हुए सत्कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करना चाहिए। यह सब हमें दूसरों पर दया करने से प्राप्त होता है। परमपिता की दया से दुनिया दर्शन का मेला है, जब भी मेला लगा करता है कोई भी मेले से अपने घर जरुर आया जाता है, मेला तो बाजार है दर्शन करने के बाद में जो भव बनता है वह भाव ही तय करता है कि मनुष्य नर्क में जायेगा या की बैकुंठ में जायेगा। दर्शन का मतलब होता देखना, देखने से मन शुध्द होगा तो भव अच्छा बनेगा तो कर्म अच्छे होंगे तो मार्ग भी अच्छा बनेगा, और वही मार्ग आपको बैकुंठ के द्वार तक ले जायेगा।
संत सबसे बड़ा कवच है
बुधवार को कथा के दौरान भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा ने जब संत श्री गोविन्द जाने का आशीर्वाद लिया तो माहौल पूरी तरह संत मय हो गया। संत श्री गोविन्द जाने ने कहा कि संत राष्टÑ के लिए रक्षा का कवच है। जिस तरह से सैनिक सीमा पर सुरक्षा करते है, वैसे ही संत मानव जाति के कल्याण के लिए चिंतन करते है। लोगों में धर्म के प्रति जागृति लाते है।
12 बजे से तीन बजे तक
नगर के सिंधी कालोनी स्थित परिसर में जारी संगीतमय श्रीमद भागवत कथा आयोजन गौदान सरकार सेवा समिति के पदााधिकारी लोकेन्द्र मेवाड़ा ने बताया कि कथा दोपहर बाहर बजे से तीन बजे तक जारी रहती है।
दया धर्म का मूल है
दया धर्म का मूल है पर संत श्री गोविन्द जाने ने कहा कि दया मानव को करना चाहिए, व्यक्ति अज्ञानतावश ईश्वर को जगह-जगह तलाशता फिरता है, जबकि ईश्वर स्वयं उसके अंदर है। बस इसे पहचानने की जरुरत है। जैसे सोने की पहचान जौहरी करता है, उसी प्रकार हमें भी अपने अंदर झांककर ईश्वर के अस्तित्व को महसूस करने की जरूरत है। मनुष्य को यह योनि बार-बार नहीं मिलती लिहाजा मनुष्य को इस योनि का फायदा उठाते हुए सत्कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करना चाहिए। यह सब हमें दूसरों पर दया करने से प्राप्त होता है। परमपिता की दया से दुनिया दर्शन का मेला है, जब भी मेला लगा करता है कोई भी मेले से अपने घर जरुर आया जाता है, मेला तो बाजार है दर्शन करने के बाद में जो भव बनता है वह भाव ही तय करता है कि मनुष्य नर्क में जायेगा या की बैकुंठ में जायेगा। दर्शन का मतलब होता देखना, देखने से मन शुध्द होगा तो भव अच्छा बनेगा तो कर्म अच्छे होंगे तो मार्ग भी अच्छा बनेगा, और वही मार्ग आपको बैकुंठ के द्वार तक ले जायेगा।
संत सबसे बड़ा कवच है
बुधवार को कथा के दौरान भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा ने जब संत श्री गोविन्द जाने का आशीर्वाद लिया तो माहौल पूरी तरह संत मय हो गया। संत श्री गोविन्द जाने ने कहा कि संत राष्टÑ के लिए रक्षा का कवच है। जिस तरह से सैनिक सीमा पर सुरक्षा करते है, वैसे ही संत मानव जाति के कल्याण के लिए चिंतन करते है। लोगों में धर्म के प्रति जागृति लाते है।
12 बजे से तीन बजे तक
नगर के सिंधी कालोनी स्थित परिसर में जारी संगीतमय श्रीमद भागवत कथा आयोजन गौदान सरकार सेवा समिति के पदााधिकारी लोकेन्द्र मेवाड़ा ने बताया कि कथा दोपहर बाहर बजे से तीन बजे तक जारी रहती है।








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