श्रवण मावई
सीहोर। जिले के उपभोक्ताओं को संरक्षण देने वाली परिषद का गठन बीते 25 सालों में नहीं हो पाया। अंदाज लगाया जा सकता है कि गला काट व्यापारिक प्रतिद्वन्ता के दौर में उपभोक्ता कीमत , वजन, मात्रा, गुणवत्ता आदि हर मौके पर ठगा जा रहा है।
आज से ठीक 25 साल पहले 24 दिसंबर 1986 को देश में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम की धारा 8 के प्रावधानों के तहत देश और प्रदेश के साथ जिला स्तर पर भी उपभोक्ता संरक्षण परिषद का गठन किया जाना तय किया गया। इसके गठन के उददेश्यों पर अधिनियम में प्रकाश डाला गया है कि उपभोक्त ा को वस्तु या सेवाएं निर्धारित कीमत, वजन, मात्रा और बेहतर गुणवत्ता के साथ मिल सके ताकि उसका व्यापारिक रूप से शोषण रोका जा सके। इस परिषद के गठन के प्रावधानों में कलेक्टर अध्यक्ष और शासकीय व गैरशासकीय नामांकित सदस्य होंगे जो उपभोक्ताओं के अधिकारों का संरक्षण करेंगे। प्रावधानों के मुताबिक इस परिषद की बैठक अध्यक्ष के विवेक अनुसार साल में कम से कम दो बार और आवश्यकतानुसार कितनी भी बार की जा सकती है।
जिले में उपभोक्ता फोरम का गठन तो हुआ जो उपभोक्ता के साथ सेवाओं में कमी आने पर उसका अधिकार न्यायिक प्रक्रिया द्वारा दिलाती है, लेकिन उपभोक्ता, बाजार या अन्य सेवाओं में ठगा न जा सके इस पर नियंत्रण करने के लिए गठित होने वाली जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद का गठन बीते 25 सालों में जिले में नहीं हो पाया। समभवत: यही कारण है कि 40 प्रतिशत से ज्यादा बाजार पर नकली या सरकारी भाषा मेें कहे तो अमानक सामान ने कब्जा कर रखा है। स्वयं विभिन्न सरकारी आकड़े इस बात के गवाह है कि बाजार में से सामानों के एकत्रित किए गए नमूने सरकार की प्रयोगशाला में अमानक पाए गए। जिन्हें सीधे शब्दों में नकली या गुणवत्ताहीन कहा जा सकता है। सवाल यह उठता है कि 25 साल के लंबे अर्से में कानूनी प्रावधान होने के बाद भी उपभोक्ता के संरक्षण की पहल क्यों नहीं हुई । क्या बाजार की पूंजी और प्रशासन की शक्ति की मिली भगत से उपभोक्ता बाजार में लुट रहा है।
जिला खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी एसके जैन से संपर्क करने के प्रयास किए गए लेकिन उनका मोबाइल लगातार बंद आया।







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