शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बीच साठ-सत्तर के दशक तक भले ही सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते रहे हों... एसपी सिंह के जमाने से पत्रकारिता में सक्रिय साहित्यकारों पर सवाल उठने शुरू हुए। पहली बार उन्हें पोंगापंथी पत्रकार तक कहा गया। भाषायी शुद्धतावादी और आग्रही होने के आरोप भी चस्पा हुए... धीरे-धीरे ये प्रवृत्ति हिंदी पत्रकारिता की बाद की पीढ़ियों में इतने गहरे तक धंस गई कि हिंदी साहित्य को कम से कम पत्रकारिता की दुनिया में बाहरी ग्रह का प्राणी माना जाने लगा, लेकिन पत्रकारिता के मन में एक बात छुपी रही...वह गंभीर और बौद्धिक होने का तमगा हासिल करने के चक्कर में इसी साहित्यकारिता और साहित्यिक लेखन के शरण में ही जाती रही। अंग्रेजी में कहते हैं न लव एंड हेट तो कुछ वही रिश्ता रहा...आज ये प्रवृत्ति खासतौर पर नजर आ रही है। साहित्यकारों को पत्रकारिता में उचित मुकाम तक पहुंचने ना दो, लेकिन गंभीरता और विमर्शवादी होने का प्रमाणपत्र उसी से हासिल करो, क्योंकि हिंदी का पाठक उसके ही प्रमाणपत्र को ज्यादा साखदार मानता है। इसी दौर में कुछ ऐसे भी पत्रकार रहे, जिन्होंने पत्रकारिता के धत्कर्माें से आजिज आकर पूरी तरह साहित्यकारिता को ही अपनी जिंदगी में बसा लिया। मध्यप्रदेश से दो नाम इन दिनों हिंदी साहित्य के आकाश में बेहद चर्चित हैं। पीली छतरी वाली लड़कियां, पाल गोमरा का स्कूटर, वारेन हेस्टिंगस का सांड, और अंत में प्रार्थना जैसी कहानियों के लेखक उदय प्रकाश को अब हिंदी का हर जागरूक पाठक जानता है। पाठकों की विशाल पूंजी में इन दिनों सफल सेंध मध्य प्रदेश के सीहोर निवासी पंकज सुबीर ने भी लगाई है।
उनके उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं’ को हाल ही में दो-दो पुरस्कार मिले हैं। पहले इसी उपन्यास को ज्ञानपीठ ने अपने युवा सम्मान से नवाजा और अब जेसी जोशी स्मृति संस्थान ने शब्द साधना जनप्रिय युवा सम्मान से नवाजा है। जिंदगी की लड़ाई जवानी में ही बेहद मुश्किल दौर में होती है। हर हिंदी रचनाकार इसी दौर से निकलना और उसके बाद स्थायीत्व के साथ सुकून से रचाव की दुनिया में बसने की ख्वाहिश पाले होता है, लेकिन पहले टेलीविजन पत्रकार रहे सुबीर ने टेलीविजन पत्रकारिता की दुनिया को तभी अलविदा कह दिया, जब उनके सामने चुनौतियों के बावजूद संभावनाओं का खुला आकाश था। उन्होंने अपेक्षाकृत ज्यादा चुनौतीपूर्ण लेखन को पूरी तरह से अपना लिया। इसी दौरान उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी कई सशक्त कहानियां लिखीं और पाठकों के साथ ही समीक्षकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया। पंकज ने इसी दौर में स्वतंत्रता आंदोलन में अपने शहर की लोकजीवन की उन घटनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जो अक्सर इतिहास में जगह नहीं हासिल कर पातीं, जबकि इतिहास रचने और बदलने में उनका भी वैसा ही योगदान होता है। इसी मेहनत को उन्होंने औपन्यासिक रचना का कलेवर दिया और ये वो सहर तो नहीं जैसी कृति हिंदी साहित्य को मिल सकी। पंकज का स्वतंत्र रूप से अब तक सिर्फ एक ही कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कंपनी और एक ही उपन्यास ये वो सहर तो नहीं ही आया है। लेकिन तीन और संग्रहों में उनकी कहानियां प्रतिष्ठापूर्ण स्थान हासिल कर चुकी हैं। सीहोर का ये युवा रचनाकार अपने शहर की पहली किन्नर मेयर ममता की जिंदगी को आधार बना कर इन दिनों लेखन की तैयारियों में जुटा है। पंकज की खासियत उनकी भाषा है। उसमें रचाव तो नजर आता है...लेकिन बनावटीपन नजर नहीं आता। अपने कथाक्रम में वे कई बार चौंकाते भी हैं, लेकिन ये चौंकाना भी प्रकारांतर से नए प्रसंगों का परिचय ही कराता है। पाठक को इस तरह से जोड़ना और अपनी बात उसके अंतरतम तक पहुंचा पाने की उनकी ये शैली है और अपनी इसी शैली के कारण कथा जगत के उदीयमान हस्ताक्षरों में पहली पंक्ति में नजर आते हैं।
- उमेश चतुर्वेदी

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